Wednesday, 12 June 2013

दीवारें


दीवारें ही दीवारें हैं आजकल
अभिव्यक्ति-विहीन बेलौस दीवारें
चुप......शांत
सन्नाटा बुनती
दम साधे खडी हैं
बेहद डरी हुई 
घबराई सी....आशंकित.
न जाने कब क्या हो जाए !!
पर फिर भी जब कभी
कोई खिलखिलाहट गूँजती है
अशोक की ओट से
तो हरहरा उठती है दीवार
मानों अभी कोई
....मनचला उठा लेगा कलम
मानों कोई अल्लहड़ सी बालिका
उठाकर अपनी कूची
आंक देगी अपने रंग-बिरंगे सपने |
अभिव्यक्ति के सोए बादल
बरस उठेंगे झमाझम
फिर से भीग जाएगी
सूखी चिटकी धरा
फूट उठेंगे
अभिव्यक्ति के नए अंकुर
फिर से....|