आलोक
Thursday, 29 November 2012
भोर......
अभी-अभी
जैसे गुलाब की कली ने
पहली ही बार
दुनिया को देखा हो
नज़र-भर
|
जैसे स्वप्न से जागी न हों
उसकी उनींदीं आँखें
|
मेरी नन्हीं सी बिटिया
के पलकों के दिए में
टिमटिमाई उजास
भोरे-भोरे
हलके से मुस्कायी....
अब उठ जाऊं पापा !
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